जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 3 अप्रैल, 2025 ::

‘उदय’ का ‘अस्त’ भौगोलिक नियम है, तो ‘अस्त’ का ‘उदय’ प्राकृतिक और आध्यात्मिक सत्य है। भगवान भास्कर की अराधना का पर्व ‘छठ’ है। यह पर्व जात-पात, अमीर – गरीब के भेद-भाव को भूलकर, एक हो जाने का संदेश देता है। इस पर्व को बहुत ही पवित्र, लोकमंगल और मंगलकारक महापर्व कहा जाता है। इस व्रत को करने से पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। भारत में छठ व्रत वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में जिसे चैती छठ कहते हैं और दूसरी बार कार्तिक में जिसे कार्तिकी छठ कहा जाता है।

छठ व्रत पर भगवान सूर्य देव और छठी म‌इया की पूजा होती है। सभी लोग जानते हैं कि सूर्य देव कौन हैं , लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि और छठी म‌इया कौन हैं। पुराणों के अनुसार, माता अदिति और पिता महर्षि कश्यप के पुत्र हैं सूर्य देव। क्योंकि माता अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा जाता है और सूर्य का एक नाम आदित्य भी है। छठी म‌इया ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं और सूर्य देव की बहन हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई सोलह माताओं में सबसे प्रसिद्ध छठी म‌इया हैं। ये स्वामी कार्तिकेय की पत्नी हैं।

छठ व्रत की परंपरा में गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर होता है। इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा (छठ व्रत) में है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण जीवन को लाभान्वित भी करता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छः दिन उपरांत होती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

छठ व्रत के संबंध में कहा जाता है कि कर्ण ने सूर्य देव की पूजा सबसे पहले शूरू किया था। वे रोज घंटों तक पानी में खड़ा होकर सूर्य उपासना करते थे तथा सूर्य को अर्घ्य देते थे। एक अन्य कथा के अनुसार, जब पांडव ने जुए में अपना सारा राज पाट हार गए थे तब श्रीकृष्ण द्वारा बताए जाने पर द्रौपदी ने छठ ब्रत रखी थी। इस ब्रत को करने के उपरांत उनकी मनोकामनाएं पूरी हुई थी और पांडवों को उनका राज-पाट वापस मिला था। दूसरी किदवंती है कि छठ व्रत का उपवास भगवान राम और माता सीता ने भी रामराज्य की स्थापना के लिए, लंका पर विजय प्राप्त करने के उपरांत अयोध्या लौटने पर, रखा था तथा अर्घ्य अर्पित कर सूर्य देव की पूजा अर्चना की थी ।

‘उगते सूरज की पूजा’ तो संसार का विधान है, पर केवल हम ‘भारतवासी’ अस्ताचल सूर्य की भी अराधना करते हैं, और वो भी, उगते सूर्य से पहले। सूर्य जो पूरे दिन तपकर, अपनी पूरी ऊर्जा हमें देकर खुद अस्त होते हैं, उनकी पूजा की जाती है। फिर हम अगली सुबह उनके उगने का रात भर इंतजार करते हैं, कि अगली सुबह आप फिर आओ की हम आपकी पुनः पूजा करेंगे। यह पर्व हमें प्रकृति के नजदीक ले जाता है। इसमें प्रयोग होने वाले विभिन्न प्रकार के फल, सूप, टोकरी, ठेकुआ, खीर, सब प्रकृति को ही प्रतिनिधित्व करते हैं। तालाब, नदी, पोखर, ये सब भी तो प्रकृति को ही दर्शाते हैं। यह महापर्व एक तरह से प्रकृति के संरक्षण का भी सन्देश देता है।

भगवान भाष्कर की उपासना ही छठ पर्व है जिसमें अलौकिक शक्ति का साक्षात्कार होता है। जो पूज्य हैं अर्थात जिनकी पूजा की जाती है, भगवान सूर्य, उनका साक्षात दर्शन होता है, उनको महसूस किया जाता है। यही कारण है कि छठ को महापर्व की संज्ञा दी गई है। सूर्य देव के संतानों में पुत्र के रूप में मुख्यतः यमराज, शनिदेव, कर्ण और सुग्रीव का नाम आता है तथा उनकी पुत्री के रूप में कालिंदी और भद्रा का नाम आता है। कालिंदी को ही यमुना भी कहते हैं ।

छठ महापर्व चार दिन तक पूरे विधि विधान और पवित्रता के साथ चलने वाला महापर्व है। पहले दिन नहाय- खाय, इस दिन नदियों में स्नान कर सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल, चने का दाल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। दूसरे दिन खरना कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी को पूरे दिन प्रकाश दिन से उपवास आरंभ होता है। इस दिन रात में खीर बनती है। व्रतधारी रात में यह प्रसाद ग्रहण करती हैं। यह प्रसाद उपवास रहकर शाम को व्रती भोजन के रूप में करती है और इसके बाद से निराजली रहती है, तीसरे दिन अस्ताचल सूर्य को अर्ध्य, निराजली अवस्था में ही षष्ठी के दिन नदी, तालव, घाट पर जाकर स्नान कर डूबते सूर्य को अर्घ्य यानि दूध अर्पण कर अर्ध्य देती है और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्ध्य, सप्तमी को सूर्योदय के समय लगातार निराजली रहते हुए ही उगते सूर्य को (उदयमान सूर्य को) अर्घ्य अर्पित कर ब्रती इस महापर्व का समापन करती है।

कर्ण द्वारा घंटों तक पानी में खड़ा होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा आज भी छठ व्रतियों में प्रचलित है, जिसे कष्ठी व्रत भी कहते है।
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